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Diego Garcia पर ईरान का मिसाइल हमला: हिंद महासागर में बढ़ा तनाव, भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती?

ईरान ने हिंद महासागर में Diego Garcia स्थित ब्रिटिश सैन्य बेस की ओर दो मिसाइलें दागीं, लेकिन दोनों ही अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकीं।

Diego Garcia

दरअसल, शुक्रवार को ब्रिटेन ने कहा था कि वह अपने इस बेस का इस्तेमाल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में ईरानी हमलों को रोकने के लिए कर सकता है। इस पर ईरान ने चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका इस बेस का इस्तेमाल करेगा, तो इसे तनाव बढ़ाने वाला कदम माना जाएगा।

शनिवार को हुए इस नाकाम मिसाइल हमले के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मध्य-पूर्व का यह संघर्ष अब हिंद महासागर तक फैल गया है और इसका भारत पर क्या असर पड़ेगा।

साथ ही यह भी चर्चा है कि क्या ब्रिटेन अब इस जंग में सीधे शामिल हो रहा है और क्या इससे युद्ध और बड़ा हो सकता है।

इन घटनाओं पर करीबी नजर रख रहे विशेषज्ञों ने बीबीसी हिन्दी से बातचीत में कहा कि इस स्थिति से भारत के सामने कई नई चिंताएं उभर रही हैं। साथ ही, Diego Garcia पर हमले ने इस संघर्ष के और तेज होने की आशंका भी बढ़ा दी है।

ईरान का हमला

Diego Garcia की ओर दागी गई मिसाइलों की खबर सबसे पहले ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ ने दी, जिसमें अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी सामने आई।

इसके बाद बीबीसी ने भी अलग-अलग सूत्रों से बात कर इस खबर की पुष्टि की।

हालांकि, ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने अब तक न तो इस बात की पुष्टि की है और न ही खंडन किया है कि ईरान ने इस बेस की ओर दो मिसाइलें दागी थीं।

हालांकि, ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि पूरे क्षेत्र में ईरान के लापरवाह हमले ‘ब्रिटिश हितों और उसके सहयोगियों के लिए खतरा’ हैं।

ब्रिटेन ने अमेरिका को डिएगो गार्सिया बेस से, जिसे वह “रक्षात्मक बमबारी मिशन” कहता है, ऐसे ऑपरेशन चलाने की अनुमति दी है। हालांकि अभी तक ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि अमेरिका ने इस बेस से कोई बमबारी मिशन शुरू किया हो।

वहीं, यह भी साफ नहीं है कि ईरान के पास ऐसी मिसाइलें हैं या नहीं जो हिंद महासागर में स्थित Diego Garcia तक पहुंच सकें। यह बेस ईरान से करीब 3,800 मील दूर है और इसका इस्तेमाल अक्सर अमेरिकी वायुसेना के लंबी दूरी के बमवर्षक करते हैं।

अब तक माना जाता रहा है कि ईरान के पास मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिनकी रेंज करीब 2,000 किलोमीटर तक है। हालांकि कुछ सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान की ‘खोर्रमशहर’ मिसाइल की मारक क्षमता इससे ज्यादा हो सकती है।

इसराइल के अल्मा रिसर्च एंड एजुकेशन सेंटर के अनुसार, इस मिसाइल की रेंज करीब 3,000 किलोमीटर तक हो सकती है और माना जाता है कि इसे उत्तर कोरिया की एक मध्यम दूरी की मिसाइल के आधार पर विकसित किया गया है।

क्या हिंद महासागर में ईरान के मिसाइल हमले से भारत पर असर पड़ेगा?

इस सवाल पर बीबीसी हिन्दी से बातचीत में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रेमानंद मिश्रा ने कहा कि Diego Garcia को बेहद सुरक्षित क्षेत्र माना जाता है। ऐसे में वहां ईरान का हमला, भले ही निशाना चूक गया हो, भविष्य के लिए खतरे का संकेत देता है और भारत की हिंद-प्रशांत रणनीति के लिए चिंता बढ़ाता है।

उन्होंने कहा कि इससे समुद्री मार्गों पर जहाज़ों की स्वतंत्र आवाजाही और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता, खासकर मैरीटाइम सिक्योरिटी नीति, पर सवाल खड़े होते हैं।

मिश्रा के मुताबिक, अगर आगे चलकर यह संघर्ष और बढ़ता है और चीन-अमेरिका के बीच टकराव की स्थिति बनती है, तो भारत के सामने बड़ी चुनौती होगी। हिंद-प्रशांत और हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए डिएगो गार्सिया का महत्व काफी ज्यादा है।

उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर भारत और अमेरिका के बीच एक तरह का सहयोग रहा है। ऐसे में अगर खतरा बढ़ता है, तो भारत की निर्भरता अमेरिका पर और बढ़ सकती है, क्योंकि चीन के बढ़ते प्रभाव और निगरानी का अकेले सामना करना भारत के लिए आसान नहीं है।

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मिडिल ईस्ट इनसाइट्स प्लेटफॉर्म की संस्थापक डॉ. शुभदा चौधरी के मुताबिक, Diego Garcia पर ईरान का मिसाइल हमला भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है और इससे भारत की सैन्य क्षमताओं की सीमाएं भी सामने आती हैं।

वह बताती हैं कि डिएगो गार्सिया भारत के दक्षिणी हिस्से से करीब 4,000 किलोमीटर दूर है, जो ज्यादातर भारतीय लड़ाकू विमानों की रेंज से बाहर है। वहां तक पहुंचने के लिए कई बार हवा में ईंधन भरना पड़ता है, जबकि इस क्षेत्र में भारत की क्षमता सीमित है।

उन्होंने यह भी कहा कि अग्नि-III, IV और V जैसी लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें इस दूरी तक पहुंच सकती हैं, लेकिन इन्हें परमाणु निवारण के लिए तैयार किया गया है, न कि सटीक पारंपरिक हमलों के लिए।

चौधरी के अनुसार, डिएगो गार्सिया में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी है, जिसमें कैरियर स्ट्राइक ग्रुप, पैट्रियट और थाड जैसे एयर डिफेंस सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमताएं शामिल हैं, जो ज्यादातर हमलों को नाकाम कर सकती हैं।

साथ ही, अमेरिकी और ब्रिटिश परमाणु पनडुब्बियां भी इस क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहती हैं, जिससे किसी भी भारतीय नौसैनिक टास्क फोर्स को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही पनडुब्बी-रोधी खतरों का सामना करना पड़ सकता है।

ब्रिटेन और यूरोप अब तक ईरान के साथ इस संघर्ष में सीधे शामिल होने से बचते रहे हैं। लेकिन क्या डिएगो गार्सिया पर हुए मिसाइल हमले से यह रुख बदल सकता है?

प्रोफेसर प्रेमानंद मिश्रा का कहना है कि इस हमले के बाद ब्रिटेन की झिझक खत्म हो सकती है। उनके मुताबिक, अगर डिएगो गार्सिया जैसे ठिकाने पर आईआरबीएम का इस्तेमाल किया जाता है, तो इसका मतलब है कि दुनिया भर में ब्रिटेन के नौसैनिक और सैन्य अड्डे खतरे में आ सकते हैं। ऐसे में ब्रिटेन और यूरोप को अमेरिका के साथ खड़ा होना पड़ सकता है।

वह यह भी कहते हैं कि यह घटना यूरोप के लिए भी एक संकेत है कि उनके सैन्य ठिकाने पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, और ईरान का यह कदम इस संघर्ष को और तेज कर सकता है।

वहीं, शुभदा चौधरी का मानना है कि अमेरिका और ब्रिटेन के बीच ‘विशेष संबंध’ इतने मजबूत हैं कि किसी बड़े अमेरिकी सैन्य अभियान में ब्रिटेन का तटस्थ रहना लगभग नामुमकिन है।

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साथ ही, नाटो के ढांचे के तहत खुफिया जानकारी साझा करने और सैन्य समन्वय की प्रक्रिया अपने आप सक्रिय हो जाती है, जिससे दोनों देशों की संयुक्त कार्रवाई की संभावना बढ़ जाती है।

वह कहती हैं, “ब्रिटेन ‘फाइव आइज़’ गठबंधन का अहम हिस्सा है। ऐसे में ईरान से जुड़े किसी भी टकराव में अमेरिका के साथ खुफिया जानकारी साझा करना उसकी संधि के तहत जिम्मेदारी है, चाहे ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर चाहें या नहीं।”

“इसके अलावा,Diego Garcia हिंद महासागर में ब्रिटेन का क्षेत्र (BIOT) है, जिसे अमेरिका को इस्तेमाल के लिए दिया गया है। मध्य-पूर्व में किसी भी अमेरिकी हवाई अभियान में इस बेस का उपयोग होता है, जिससे ब्रिटेन अपने आप इस संघर्ष में शामिल माना जाता है।”

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